Saturday, April 9, 2011

सर जायेगा

नफरतों से जब कोई भर जायेगा
काम कोई दहशती कर जायेगा

इक गली,इक बाग़ कोई छोड़ दो
एक बच्चा खेल कर घर जायेगा

बागबाँ को क्यों खबर होती नहीं
फूल इक अहसास है मर जायेगा

रेत के सहरा को कब मालूम है
एक बादल तर-ब-तर कर जायेगा

अब यक़ीनन राह भूलेगा कोई
जब कोई यूँ कौम को भरमायेगा

काश कोई इन धमाकों को कहे
नींद में बच्चा कोई डर जायेगा

हुक्मरां की चाल तो तफरीह है
फिर किसी प्यादे का ही सर जायेगा

Friday, April 8, 2011

रेत राग

कोसों तक
जब सिर्फ सन्नाटा गूंजता है
तब बजाता है आदमी
बांसुरी,अळगोजा
मोरचंग,खड़ताल
रावणहत्था या सारंगी
बहुत अकेला हुआ आदमी
तब गाता है
रेत राग

Thursday, April 7, 2011

कैसी होती है रेत

कैसी होती है रेत

सिहर उठता हूँ मैं
यह सोच कर
अगर किसी दिन मेरी पोती ने पूछ लिया

क्या होता है ?
फोग,खींप,बुई
आक ,सत्यानाशी,जंगल जलेबी
कागारोटी,इमली,निम्बोली,ब़रबंटा
सेवण,धामन,कांस,सरकंडा

क्या होता है ?
कागडोड,कमेड़ी
सियार,लोमड़ी
मोर,कबूतर,कौव्वा,गिद्ध
गोह,गोयरा,सांप,सलेटिया
बघेरा,तेंदुआ,नाहर

क्या होता है ?

आँगन,सेहन,चौबारा
तिबारा,टोडी,छज्जा
मालिया,दुछत्ती,गुभारिया

अगर उस ने पूछ ही लिया किसी दिन
क्या होती है गाय
कैसी होती है रेत
तब मेरे पास शायद न हो इन के फोटो भी

Wednesday, April 6, 2011

चांदनी रात में रेगिस्तान

चांदनी रात में
रेगिस्तान खोलता है अपने राज

उन्नत वक्ष से टीले
एक के बाद एक
भिन्न रूपाकारों में
मांसल गोलाइयों से
अनावृत पसरे है
रति-श्रम से थके
या बेसुध सुरापान कर
या अम्मल डकार कर
या आत्म केन्द्रित रूप गर्विता से

सम्मोहक गहराइयाँ
विवश करती है
मुंह छुपा इस मांसल सौन्दर्य को
छु कर महसूस करने को

ये अप्रतिम, अनंत
अनगढ़,आदिम सौन्दर्य-राशि
फैली है मूक आमंत्रण सी
सभी दिशाओं में
आकंठ उब-डूब करती हुई
चाँद भी देखता है
ठगा सा

वैसे ही जैसे
कभी रह गया होगा
ठगा सा
गौतम-पत्नी अहिल्या को देख कर
शापित अहिल्या की रूप-राशि का कोई हिस्सा
प्रस्तर न बन कर
बन गया था यह रेत-राशि
चाँद आज भी
सम्मोहित देखता रहता है
जड़,निःशब्द
गौतम के शाप के बावजूद

इस अप्रतिम,अनंत
अनगढ़, आदिम सौन्दर्य-राशि के
मखमली स्पर्श को
पी लो,जी लो
या
रोम रोम में
महसूस कर लो
सिहरन सा
या अपना लो
इस जड़ निःशब्द
चाँद की साक्षी में

Thursday, March 31, 2011

मूर्ख दिवस पर

हे दुनिया के
परम बुद्धिमान लोगों
तुम्हारे सारे बहस-मुबाहसों
चिंताओं,सरोकारों
प्रतिबधताओं,पक्षधर्ताओं
का केंद्र मैं ही हूँ
किन्तु
मैं तो मूर्ख ही हूँ अभी

कितने पन्ने रंग डाले तुम ने
लाल,नारंगी स्याहियों से
फिर क्यों होता है
स्याहियों का रंग
तुम्हारे चेहरों पर नज़र आता है

कोर्पोरेट योद्धाओं से तुम
लड़ रहे होते हो
अपने अपने ब्रांड के लिये

कितने बड़े हो जाते है
तुम्हारी नाकों के दायरे
हवा में चला घूँसा भी
लगता है तुम्हारी नाक पे

हे परम बुद्धिमानों
एक इच्छा है इस मूर्ख की
तुम्हारी नाक में तिनका कर
तुम्हारी छींक की
आकाशी गर्जना सुनने की
क्या तुम मुझे
इस मूर्खता की अनुमति दोगे
मैं जानता हूँ
तुम हंस रहे हो
मेरी मूर्खता पर
मेरे भोलेपन पर
लाड आता है तुम्हे
तुम्हारी प्रतिबधता की प्रत्यंचा
और तन जाती है

परम बुद्धिमानों
मैं वज्रमूर्ख खुश हूँ
अपनी मूर्खता में
कालिदास और लाओत्से की तरह

Tuesday, March 29, 2011

बेटी जवाँ हुई है

ना सांस भर के देख
स्वीकार कर के देख

बेटी जवाँ हुई है
ना आँख भर के देख

तेरा गुरुर है ये
बस आँख भर के देख

तारीख को गढ़ेगी
विश्वास कर के देख

लानत मलामतों को
इंकार कर के देख

मजबूत है ये गुडिया
ना हार कर के देख

बेलौस तरबियत का
इज़हार कर के देख

इस पर भी नेमतें कुछ
बलिहार कर के देख

करता,जता सका ना
वो प्यार कर के देख

Sunday, March 27, 2011

रेत

रेत- एक

बहुत तेज आंधी भी
समतल नहीं कर पायी
रेगिस्तान को
सिर्फ
जगह बदल कर
खड़े हो जाते है टीले
रेत- दो

टीलों पर कुछ नहीं उगता
सिर्फ
ढलान पर होती है
कुछ झाड़ियाँ

रेत- तीन

मखमली लाल तीज भी
होगी कभी इस टीले पर
जब वो तर होगा
पहली बरसात में
किन्तु
काला भूण्ड सदैव दिखता है
मल लुढ़काता हुआ
रेत- चार
रेत सिर्फ रेत है
समझ आती है
जब
हो जाओ रेत से