Friday, May 25, 2012

shabd -yaatra


शब्द खोखले 
शब्द लिजलिजे 
शब्द गुनगुने 
शब्द अनमने 
करें शब्द को तार-तार अब 
पूछें,अर्थ कहाँ छोड़ा है 
वही अर्थ 
सीधा सादा सा 
हाथ पकड़ ले 
साथ टहल ले 
पीठ खुजा दे 
करे गुदगुदी 
चाहे घाव हरे कर दे,पर 
वार केरे तो सीधा मारे 

शब्द गुलगुले से मीठे हों 
मंतव्यों की लिए श्रृंखला
निहित कहीं कुछ
गूढ़ बहुत सा
कई झरोखे 
 महराबें कुछ 
कपट-द्वार भी 
बहुत कंगूरे 
दूर दूर तक
खुदी सुरंगे
ऊबड़ खाबड़ से 
रस्ते कुछ 

तत्सम,तद्भव 
ढूँढें उद्भव 
शब्द नहीं जब 
शब्द स्वयं ही 
स्खलित अर्थ का 
अर्थ भला क्या 

शब्द अगर
बेजान हुए हैं
शायद पौरुष भी
बीता  है
कहीं कोख मे
सूनापन है
ममता का
आँचल रीता है  




Monday, May 14, 2012

bonsaai

गमलों मे 
कब पेड़ पनपता 
कोई बोनसाई ही होगा 
पेड़ नहीं 
तदरूप और विद्रूप 
भले हो 
बौनी ताकत
छाया,फल कब दे पाएगी 
किसी बेल को 
कहाँ सहारा मिल पायेगा
कहाँ बसेरा ले पायेगा
कोई पखेरू
प्राण-वायु मुट्ठी भर भी
जो दे ना पाए
क्या करना है
इन पेड़ों का
जीवन का स्पंदन धडके
ऐसे पेड़ों को
गमलों से आजाद करें अब
नहीं चाहिए
ड्राइंग रूम की शोभा केवल
कई ज़मीनी बातें
अब जीनी ही होंगी
गमले टूटेंगे
तो ही
पनपेंगे पक्का
कुछ विशाल वट वृक्ष
वही आश्वस्त करेंगे

Friday, May 4, 2012

sapna

गदबदे बच्चे सा वो 
अनमोल सपना 
रात मेरी गोद बैठा 
फिर पकड़ उंगली मेरी 
डग भर चला था

एक ललछौंही ललक सा
फिर लपक कर
डाल कर मेरे गले
छोटी सी बाँहें
देर तक लिपटा रहा
आश्वस्त करता
फुसफुसाया फिर
मैं हिस्सा हूँ तुम्हारा
इक महक बन
रम गया हूँ
बीज हूँ मैं
ढूंढ भूमि उर्वरा अब
मैं फलूँगा

इक इबारत हूँ
मुझे लिख
आसमां पर
मैं बरस जाऊँगा इक दिन
गा उठेगी
ये धरा भी
पाल मुझ को

थपकियाँ दे
मत सुला
जागा रहा तो
जिंदगी के अर्थ
तुझ पर खोल दूंगा

मैं हूँ कुंजी
हूँ इशारा
साथ ले मुझ को
चला चल
बंद दरवाज़ों के
पीछे क्या
तुझे बतला सकूंगा

Thursday, May 3, 2012

सुन गोविंदा

सुन गोविंदा 
भिखमंगों की इस टोली को 
कैसे तू संतुष्ट करेगा 
कैसे सिद्ध करेगा 
दाता इक तू ही है 
ऐसे वैसे 
कैसे कैसे 
जैसे तैसे 
सभी डटे हैं 
मांग पत्र की फोटोकॉपी 
सब हाथों में 

तुझे समर्पित 
पत्र पुष्प ये 
पान ,इत्र के फाहे 
तुलसी,गंगाजल ये 
झांकी ये छप्पन भोगों की 
एक लिसलिसी लार सने हैं 

कौन आया है 
तुझ से मिलने 
सब तुझ को 
केसिनो समझें 
दांव लगाते 
एक लगा कर 
शायद लाख बना पाएंगे 

नहीं चाहता बनूँ 
भीड़ का हिस्सा 
फिर भी 
मन पापी है 
चोरी चोरी 
देख रहा 
छप्पन भोगों को 

सच्चा है 
आँखों का खारा पानी 
फिर भी 
लाओ इन से 
चरण पखारूँ

Tuesday, April 17, 2012

सच के चूहे

सच कहना कुछ खतरनाक है
ये पक्का था
बहुत कुलबुलाता रहता था
मगर वो कीड़ा
इक हांडी में गाड़ दिया
घर के पिछवाड़े
और सजा दी
इक सुन्दर सी फुलवारी भी
वहम भरी तितली
मंडराती ही रहती थी

सच के कीड़े
कुछ दर्दीले
कई कंटीले और पनीले
बन जाते हैं
झबरीली पूंछों के चूहे
कुतर गये वो
गढ़ी गयी
समतल,चिकनी
रपटीली सतहें
कुतर गये
कुछ घिसे गये
कोनों की आभा
रेगमाल की रगडें खा कर
एक सुच्चिकन
इक मनभावन
देह लिए जो
रातों होड किया करते थे
इन तारों से

क्या कुतरा है
झूठ लिथडता ही रहता है
जैसे उधड़ा फाल
पुरानी साड़ी का हो

सच के चूहे शायद कुतरें
अंधकार भी
झाँक रहा हो
जिस के पीछे
नन्हा सूरज
सच का पैरोकार
रौशनी का हामी भी 

Saturday, April 14, 2012

एक गज़ल

मत करो तीखे सवाल
बेवज़ह होगा बवाल

यूँ कहाँ किस्मत पलटती
छोड़,मत सिक्का उछाल

कीमती कुछ तो मिलेगा
याद कि सलवट खंगाल

अब मदारी बेवज़ह हैं
चल ज़मूरे पर निकाल

तल्ख़ आपाधापियों में
क्या हराम औ क्या हलाल

इक नया सूरज तलाशो
ये अंधेरों का दलाल 

Wednesday, April 11, 2012

jaan ramdhan


दांव लगाता इक सटोरिया 
जिंस कई गायब हो जाती
 बिक जाती धनिया की हंसुली 
मंगल सूत्र लरजते कितने 
उठापटक होती शेयर की 
धमा चौकड़ी बाज़ारों में 
सोने सी फसलें खेतों में 
खड़ी खड़ी मिटटी हो जाती 
हरे भरे कुछ बाग बगीचे 
बच्चों की थोड़ी किलकारी 
कुछ जवान सपने सिन्दूरी 
हांड़ी में खिचड़ी की खदबद
सब सहमे से 
और गाय की आँख 
उदासी से भर जाती 

सूखे आंसू लिए रामधन
 किस  को कोसे 
धरती ने भरपूर दिया है 
किस जादू से उस का सोना
मिटटी होता 
सर में सींग  उगाए 
थोड़े पेट थुलथुले
 एक फोन पर ले उड़ते 
रोटी की थाली 
प्याज मिर्च तक गायब कर दें 

जान रामधन
कमोडिटी एक्सचेंज का डिब्बा 
क्यों हँसता है