एक ग़ज़ल
ख़त आता था ख़त जाता था
बहुत अनकही कह जाता था
बूढ़े बरगद की छाया में
पूरा कुनबा रह जाता था
झगडा मनमुटाव ताने सब
इक आंसू में बह जाता था
कहे सुने को कौन पालता
जो कहना हो कह जाता था
तन की मन की सब बीमारी
माँ का आँचल सह जाता था
कई दिनों का बोल अबोला
मुस्काते ही ढह जाता था
लाख अभावों के जीवन में
भाव सदा ही बच जाता था
Saturday, February 26, 2011
Friday, February 25, 2011
एक ग़ज़ल
अब दगों की ही रवायत हो गई
ज़िन्दगी गोया तवायफ हो गई
अब वफ़ा ही शूल सी चुभने लगी
आप की जब से इनायत हो गई
है मुहब्बत कह दिया चौराहे पर
जाने किस किस से अदावत हो गई
जो हुए गाफिल तो भुगतेंगे जनाब
आप को कैसे शिकायत हो गई
यूँ किताबों में लिखे अधिकार है
मांग बैठे,बस क़यामत हो गई
तान के मुक्का यूँ ही लहरा दिया
लीजिये अपनी बगावत हो गई
ज़िन्दगी गोया तवायफ हो गई
अब वफ़ा ही शूल सी चुभने लगी
आप की जब से इनायत हो गई
है मुहब्बत कह दिया चौराहे पर
जाने किस किस से अदावत हो गई
जो हुए गाफिल तो भुगतेंगे जनाब
आप को कैसे शिकायत हो गई
यूँ किताबों में लिखे अधिकार है
मांग बैठे,बस क़यामत हो गई
तान के मुक्का यूँ ही लहरा दिया
लीजिये अपनी बगावत हो गई
एक ग़ज़ल
अब दगों की ही रवायत हो गई
ज़िन्दगी गोया तवायफ हो गई
अब वफ़ा ही शूल सी चुभने लगी
आप की जब से इनायत हो गई
है मुहब्बत कह दिया चौराहे पर
जाने किस किस से अदावत हो गई
जो हुए गाफिल तो भुगतेंगे जनाब
आप को कैसे शिकायत हो गई
यूँ किताबों में लिखे अधिकार है
मांग बैठे,बस क़यामत हो गई
तान के मुक्का यूँ ही लहरा दिया
लीजिये अपनी बगावत हो गई
ज़िन्दगी गोया तवायफ हो गई
अब वफ़ा ही शूल सी चुभने लगी
आप की जब से इनायत हो गई
है मुहब्बत कह दिया चौराहे पर
जाने किस किस से अदावत हो गई
जो हुए गाफिल तो भुगतेंगे जनाब
आप को कैसे शिकायत हो गई
यूँ किताबों में लिखे अधिकार है
मांग बैठे,बस क़यामत हो गई
तान के मुक्का यूँ ही लहरा दिया
लीजिये अपनी बगावत हो गई
Tuesday, February 22, 2011
एक ग़ज़ल
खोट के सिक्के चलाये जा रहे है
लोग बन्दर से नचाये जा रहे है
आसमां में सूर्य शायद मर गया है
मोमबत्ती को जलाये जा रहे है
देखिये तांडव यहाँ पर हो रहा है
रामधुन क्यों गुनगुनाये जा रहे है
जो पिघल कर मोम से बहने लगे है
लोग वो काबिल बताये जा रहे है
आप को वो स्वप्नजीवी मानते है
स्वप्न अब रंगीन लाये जा रहे है
देखते है आसमां कैसे दिखेगा
शामियाने और लाये जा रहे है
लोग बन्दर से नचाये जा रहे है
आसमां में सूर्य शायद मर गया है
मोमबत्ती को जलाये जा रहे है
देखिये तांडव यहाँ पर हो रहा है
रामधुन क्यों गुनगुनाये जा रहे है
जो पिघल कर मोम से बहने लगे है
लोग वो काबिल बताये जा रहे है
आप को वो स्वप्नजीवी मानते है
स्वप्न अब रंगीन लाये जा रहे है
देखते है आसमां कैसे दिखेगा
शामियाने और लाये जा रहे है
Sunday, February 20, 2011
एक ग़ज़ल
हिल गए आधार है शायद जमीं के
ध्रुव तलक लगता नहीं काबिल यकीं के
खुश्क धरती का कलेजा फट गया है
है नहीं आसार अब बाकी नमी के
अब मकां न है नजर आती दीवारें
लोग रहते है यहाँ लगते कहीं के
रोज़ खाली हाथ लौटा उस गली से
इस कदर झूठे इशारे महज़बीं के
वक़्त गन्दी नालियों सा बह रहा है
आदमी-दर-आदमी साये गमी के
रोज़ काले बादलों की भीड़ लगती
आसमां में दायरे लेकिन कमी के
ध्रुव तलक लगता नहीं काबिल यकीं के
खुश्क धरती का कलेजा फट गया है
है नहीं आसार अब बाकी नमी के
अब मकां न है नजर आती दीवारें
लोग रहते है यहाँ लगते कहीं के
रोज़ खाली हाथ लौटा उस गली से
इस कदर झूठे इशारे महज़बीं के
वक़्त गन्दी नालियों सा बह रहा है
आदमी-दर-आदमी साये गमी के
रोज़ काले बादलों की भीड़ लगती
आसमां में दायरे लेकिन कमी के
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