Friday, April 15, 2011

खता रही ना

अपना पीना भी क्या पीना
जीना मरना,मरना जीना

उन को प्राणायाम लगा है
हांफा जब भी अपना सीना

कितने फ़र्ज़,क़र्ज़ कितने थे
रहा सफ़र में सदा सफीना

एक अंगूठी बन जायेगा
कहाँ अकेला रहा नगीना

हर कश्ती को पार लगाये
ऐसी कोई हवा बही ना

बातें भी शमशीरें होती
हुई कभी भी सुना सुनी ना

रिश्ते क्यों बेमानी लगते
अपनी कोई खता रही ना

Wednesday, April 13, 2011

अहसान है

हादिसों का चार सू इमकान है
लोग महफ़िल के मगर अनजान है

तोड़ देते आदमी की रूह को
ये ग़ज़ब के सिरफिरे अरमान है

क्या तआर्रुफ़ पूछते है बारहा
आप जैसे हूबहू इंसान है

उन फरिश्तों की अलग तासीर थी
इन फरिश्तों का अलग ईमान है

चाँद से जब से हुई है दोस्ती
चाँदनी मेरे यहाँ मेहमान है

खासियत तो देखिये पापोश की
हर क़दम की रूह की पहचान है

राह भूला भी नहीं,भटका नहीं
बस मेरा खुद पर यही अहसान है

Monday, April 11, 2011

भाया नहीं

गो कहन में इल्म का साया नहीं
राग फिर भी बेसुरा गाया नहीं

छान मारे कारवां औ रहगुजर
रहबरों में कुछ हुनर पाया नहीं

एक पूँजी सी मिली थी ज़िन्दगी
एक लम्हा भी किया जाया नहीं

वो बुलंदी इसलिये ना पा सका
खाक होने का शऊर आया नहीं

सब मुखौटा हों हमें मंज़ूर है
तू मुखौटा हो ये कुछ भाया नहीं

हम जले, जलते रहे है बारहा
क्यूँ अभी माहौल गरमाया नहीं

Saturday, April 9, 2011

सर जायेगा

नफरतों से जब कोई भर जायेगा
काम कोई दहशती कर जायेगा

इक गली,इक बाग़ कोई छोड़ दो
एक बच्चा खेल कर घर जायेगा

बागबाँ को क्यों खबर होती नहीं
फूल इक अहसास है मर जायेगा

रेत के सहरा को कब मालूम है
एक बादल तर-ब-तर कर जायेगा

अब यक़ीनन राह भूलेगा कोई
जब कोई यूँ कौम को भरमायेगा

काश कोई इन धमाकों को कहे
नींद में बच्चा कोई डर जायेगा

हुक्मरां की चाल तो तफरीह है
फिर किसी प्यादे का ही सर जायेगा

Friday, April 8, 2011

रेत राग

कोसों तक
जब सिर्फ सन्नाटा गूंजता है
तब बजाता है आदमी
बांसुरी,अळगोजा
मोरचंग,खड़ताल
रावणहत्था या सारंगी
बहुत अकेला हुआ आदमी
तब गाता है
रेत राग

Thursday, April 7, 2011

कैसी होती है रेत

कैसी होती है रेत

सिहर उठता हूँ मैं
यह सोच कर
अगर किसी दिन मेरी पोती ने पूछ लिया

क्या होता है ?
फोग,खींप,बुई
आक ,सत्यानाशी,जंगल जलेबी
कागारोटी,इमली,निम्बोली,ब़रबंटा
सेवण,धामन,कांस,सरकंडा

क्या होता है ?
कागडोड,कमेड़ी
सियार,लोमड़ी
मोर,कबूतर,कौव्वा,गिद्ध
गोह,गोयरा,सांप,सलेटिया
बघेरा,तेंदुआ,नाहर

क्या होता है ?

आँगन,सेहन,चौबारा
तिबारा,टोडी,छज्जा
मालिया,दुछत्ती,गुभारिया

अगर उस ने पूछ ही लिया किसी दिन
क्या होती है गाय
कैसी होती है रेत
तब मेरे पास शायद न हो इन के फोटो भी

Wednesday, April 6, 2011

चांदनी रात में रेगिस्तान

चांदनी रात में
रेगिस्तान खोलता है अपने राज

उन्नत वक्ष से टीले
एक के बाद एक
भिन्न रूपाकारों में
मांसल गोलाइयों से
अनावृत पसरे है
रति-श्रम से थके
या बेसुध सुरापान कर
या अम्मल डकार कर
या आत्म केन्द्रित रूप गर्विता से

सम्मोहक गहराइयाँ
विवश करती है
मुंह छुपा इस मांसल सौन्दर्य को
छु कर महसूस करने को

ये अप्रतिम, अनंत
अनगढ़,आदिम सौन्दर्य-राशि
फैली है मूक आमंत्रण सी
सभी दिशाओं में
आकंठ उब-डूब करती हुई
चाँद भी देखता है
ठगा सा

वैसे ही जैसे
कभी रह गया होगा
ठगा सा
गौतम-पत्नी अहिल्या को देख कर
शापित अहिल्या की रूप-राशि का कोई हिस्सा
प्रस्तर न बन कर
बन गया था यह रेत-राशि
चाँद आज भी
सम्मोहित देखता रहता है
जड़,निःशब्द
गौतम के शाप के बावजूद

इस अप्रतिम,अनंत
अनगढ़, आदिम सौन्दर्य-राशि के
मखमली स्पर्श को
पी लो,जी लो
या
रोम रोम में
महसूस कर लो
सिहरन सा
या अपना लो
इस जड़ निःशब्द
चाँद की साक्षी में