Monday, September 12, 2011

प्यार करने के पार

बहुत अंतर है
प्रेम करने और
प्रेम में होने में
मैं प्रेम करता हूँ
तुम प्रेम में होती हो

मैं प्रेम कर रहा होता हूँ
तो शायद
जी रहा होता हूँ एक तलाश
मेरी अनंत प्यास
बार बार तुम्हारी देह
और देह के पार
ढूँढती है
इक मानसरोवर
और मैं हर बार
समुद्र का खारापन
मुंह में लिए स्वयं को
खुजली का मरीज पाता हूँ
मांसल या वायवीय
कोई अनुभव
नहीं बन पाता
इस प्यास की तृप्ति
क्यों की यह प्यास
मानसरोवर की है
और उस मानसरोवर के जल
का सिर्फ
रास्ता ही जाता है तुम से

कितना ही आरोपित करो तुम
सच यही है कि
मैं जो ढूंढ रहा हूँ
वो तुम नहीं हो
तुम में मुझे दिखाई देता है
उस का आभास
जो चाहिए मुझे
इसीलिए चाहता हूँ तुम्हे बार बार
मोहभंग भी
होता है बार बार

तुम भी जीना चाहती हो जो
वो नहीं है मेरे पास
वो भी कहीं है मेरे पार
मैं भी हूँ एक द्वार ही
और दो द्वार
एक दूसरे के भीतर से
नहीं निकल सकते
वही पार हो पायेगा
द्वार से जो नहीं रहेगा द्वार
झाँक कर देखेगा
उस पार

3 comments:

avani said...

koi sabd karne hi nahi mil raha tarif karne ke liye

sushila said...

"और दो द्वार
एक दूसरे के भीतर से
नहीं निकल सकते
वही पार हो पायेगा
द्वार से जो नहीं रहेगा द्वार
झाँक कर देखेगा
उस पार"

बेहतरीन !

Premchand Gandhi said...

प्‍यार के द्वंद्व को खोलती यह एक बहुत अच्‍छी कविता है यह... गहरी प्रश्‍नाकुल भी और मासूम जवाबों सी भी... प्‍यार भी एक छलना ही है...