Sunday, August 19, 2012

सुन रे कलुआ

सुन रे कलुआ
प्रेम लिखें क्या ?
चल जुगाड कर
कोई कलेंडर
औरत की फोटू वाला हो
ढूंढ कि इस में
प्रेम छिपा है
बालों में
आँखों में होगा
माथे की सलवट खंगाल तो
कानों के पीछे ढूँढा क्या ?
नाक देख तो
सांस पता कर
गन्ध कोई तो
आती होगी
गर्दन देखी ?
कन्धों पर लटका हो शायद
देख जरा
हाथों में क्या है
अरे भाग्य रेखा में होगा
छिपा उँगलियों की पोरों में
या फिर गर्म हथेली में हो

देख
झटक कर इन सपनों को
उखड़ी साँसों का
हिसाब कर
आंसू को
थोडा उबाल ले
तकिये का
गीलापन देखा ?

चल रे छोड़
पलट थोडा तो
देख दिठौने में दिखता है
मौली के धागे में बैठा
वहाँ बाजरे के सिट्टे में
चने के खट्टे साग में होगा
रोटी की सौंधी
सुगंध में

थोडा धौल धप्पे में
भी है
मीठी सी
झिडकी,गाली में

ये पक्का भगवान के जैसा
मिले कहाँ
ये किसे पता है

पता कहीं दे
मिले कहीं पे 

No comments: